1. एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिए:
1. नारी किसके समान सहनशील होती है?
उत्तरः नारी धरती के समान सहनशील होती है।
2. नारी बचपन में किसके मन में हिलोरें उठाती है?
उत्तरः नारी बचपन में अपने माता-पिता के हृदय में हिलोरें उठाती है।
3. नारी ने इस धरती को कैसे धन्य किया है?
उत्तरः नारी ने इस धरती को स्नेह और सेवा से धन्य किया है।
4. स्वार्थी संसार क्या याद नहीं रखता है?
उत्तरः स्वार्थी संसार दूसरों के किए गये उपकारों को याद नहीं रखता है।
5. नारी अबला नहीं बल्कि क्या है?
उत्तरः नारी अबला नहीं बल्कि रण चंडी भी है।
6. जिसके घर में नारी का सम्मान हो वहाँ क्या होता है?
उत्तरः जिसके घर में नारी का सम्मान हो वहाँ आनंद का सागर होता है।
II निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
1. नारी के विभिन्न गुणों का परिचय दीजिए।
उत्तरः नारी पृथ्वी पर मृदुल रस की तरह है। नारी सूख का सागर है, नारी वंदनीय है, अभिनंदनीय है। इसलिए उसको मैं सादर प्रणाम करता हूँ। धरती की तरह नारी सहनशील है। जल की तरह निर्मल है। फूलों की तरह कोमल है। नारी जीवन की गति है। नारी जीवन की बुद्धि है। नारी ने क्षमा, करुणा, स्नेह और अपनी सेवा से इस धरती को धन बनाया है।
2. नारी के बचपन का चित्रण कीजिए।
उत्तरः नाड़ी बचपन में चिड़िया की तरह चहकती है, फुदकती हुई इठलाती है। जिसे देख माता- पिता के मन में आनंद की हिलोरें उठती है। जब वह ठुमक ठुमक कर चलती है, तो उसकी पैड़ों की पायलियाँ मधुर संगीत सुनाती है। नारी बचपन में आंगन की तुलसी की तरह घर की शोभा बढाती है और सब को प्यारी लगती है।
3. नारी के शक्ति रूप का वर्णन कीजिए।
उत्तरः नारी शक्ति रूप है। कभी रण चंडी भी दैत्य नाशिनी दुर्गा माँ है। शक्ति तथा कात्यानी का सशक्त रूप भी नारी है। समय की मांग के अनुसार नारी दैत्यों का खून पीने वाली महा काली का वेश धारण भी कर लेती है। इस तरह नारी सृष्टि का मूल रूप है।
4. नारी किस प्रकार से सृष्टि का श्रृंगार है?
उत्तरः विभिन्न रूपों में सजी हुई यह नारी सृष्टि का श्रृंगार है। यदि इस संसार में नारी न हो तो, फिर यह संसार किस काम का है। जिसके घर में नारी का सम्मान होता है, उस घर में आनंद का सागर होता है। यदि जीवन में नारी न हो तो मानव जीवन ही व्यर्थ है। जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है।
III .संदर्भ स्पष्टीकरण कीजिए:
1. ‘इस धारा पर मृदुल रस धार- सी तुम सुख का सार होना नारी तुम वंदनीय हो, अभिनंदनीय हो, सादर तुम्हें हे नारी…..!! धरा सी सहनशील, जल- सी निर्मल, फूलों सी कोमल तुम नारी जीवन की गति, जीवन की रति जीवन की मति हो तुम नारी…..’
प्रसंगः प्रस्तुत पद को कवि-डॉ. जयंतीप्रसाद नौटियाल द्वारा लिखित ‘अभिनंदनीय नारी’ कविता पाठ से लिया गया है।
संदर्भः प्रस्तुत पद के माध्यम से कवि ने पुरुष के जीवन में नारी के महत्व के बारे में बताया है।
स्पष्टीकरणः नारी पृथ्वी पर मृदुल रस की तरह है। नारी सूख का सागर है, नारी वंदनीय है, अभिनंदनीय है। इसलिए उसको मैं सादर प्रणाम करता हूँ। धरती की तरह नारी सहनशील है। जल की तरह निर्मल है। फूलों की तरह कोमल है। नारी जीवन की गति है। नारी जीवन की बुद्धि है। नारी ने क्षमा, करुणा, स्नेह और अपनी सेवा से इस धरती को धन बनाया है।
विशेषताः नारी के कोमलता, सहनशक्ति और निर्मलता के बारे में बताया गया है।
2. ‘नारी अबला नहीं बल्कि यह नारी रण चंडी भी है, कृत्या है यह दुर्गम, दैत्य नाशिनी दुर्गा माँ भी है। शक्ति और शिवानी है यह और कात्यायिनि भी है दैत्यों के शोणित को पीने वाली महाकाली भी है॥
प्रसंगः प्रस्तुत पद को कवि-डॉ. जयंतीप्रसाद नौटियाल द्वारा लिखित ‘अभिनंदनीय नारी’ कविता पाठ से लिया गया है।
संदर्भ: प्रस्तुत पद में नारी के शक्ति के बारे में बताया गया है।
स्पष्टीकरणः नारी शक्ति रूप है। कभी रण चंडी भी दैत्य नाशिनी दुर्गा माँ है। शक्ति तथा कात्यानी का सशक्त रूप भी नारी है। समय की मांग के अनुसार नारी दैत्यों का खून पीने वाली महा काली का वेश धारण भी कर लेती है। इस तरह नारी सृष्टि का मूल रूप है।
विशेषताः नारी दुर्गा और महाकाली की तरह बहुत शक्तिशाली भी होती है।

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