हिंदी गंगा कक्षा – 9 NCERT Solution
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- “भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से –
(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।
(ख) भारत की सांस्कृक्तिक विविधता बताई गई है।
(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
(घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।
उत्तरः (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
तर्कः कविता में भारत की प्राकृतिक सुंदरता (गंगा, हिमालय), आध्यात्मिकता (ॐ) और समृद्धि (कनक शस्य) का वर्णन है, इसलिए यह विकल्प सबसे उपयुक्त है। - “कनक-शस्य-कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है-
(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
(ख) भारत की नदियों का सौंदर्य
(ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता
(घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास
उत्तरः (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
तर्कः “कनक-शस्य-कमल धरे” में सोना, फसल और कमल का उल्लेख है, जो भारत की समृद्धि और उर्वरता को दर्शाता है। - समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं-
(क) गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले
(ख) गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल
(ग) भारति, जय, विजयकरे / कनक शस्य-कमलधरे !
(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार / शतमुख-शतरव-मुखरे !
उत्तरः (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार / शतमुख-शतरव-मुखरे !
तर्कः इन पंक्तियों में चारों दिशाओं में गूँजती ध्वनि का वर्णन है, जो पूरे विश्व में भारत की महिमा के प्रसार को दर्शाता है।
4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
(क) सरल, बोल-चाल की भाषा
(ख) संस्कृतनिष्ठ और समास्युक्त
(ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण
(घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक
उत्तरः (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त
तर्कः कविता में “कनक-शस्य”, “गर्जितोर्मि”, “ज्योतिर्जल” जैसे संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त शब्दों का प्रयोग हुआ है।
5. भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
(ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम
(ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक
(घ) सामाजिक और राजनीतिक
उत्तरः (ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम
तर्कः भारत को माता के रूप में सजाकर उसकी सुंदरता का वर्णन किया गया है, जो देशप्रेम और राष्ट्रीय भावना को प्रकट करता है।
अर्थ और भाव
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) “लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!”
उत्तरः
अर्थः भारत माता के चरण कमल के समान सुंदर हैं। समुद्र की गरजती हुई लहरें उनके पवित्र चरणों को धोती रहती हैं और लंका उनके चरणों के पास स्थित है।
भावः इन पंक्तियों में कवि ने भारत की महानता और पवित्रता का वर्णन किया है। समुद्र भी भारत माता की सेवा करता हुआ प्रतीत होता है, जिससे देश की महिमा और श्रेष्ठता प्रकट होती है।
ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”
उत्तरः
अर्थ: भारत में ‘ॐ’ की पवित्र ध्वनि प्राणों के समान गूंजती है। यह ध्वनि चारों दिशाओं में फैलकर अनेक आवाज़ों के रूप में गूंज रही है।
भावः इन पंक्तियों में भारत की आध्यात्मिकता और महानता का वर्णन है। पूरे देश में पवित्रता और धार्मिक भावना फैली हुई है, जो भारत को विशेष और महान बनाती है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए –
- कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
उत्तरः कविता में कवि की देशभक्ति, गौरव और श्रद्धा की भावना व्यक्त हुई है। कवि भारत माता की महानता और सुंदरता का गुणगान करते हैं। - कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
उत्तरः कवि ने भारत के प्राकृतिक सौंदर्य को गंगा, हिमालय, पेड़-पौधे, वन, लताएँ और समुद्र के माध्यम से बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।
हाँ, प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम है, क्योंकि प्रकृति ही हमारे देश की सुंदरता और जीवन का आधार है। इसे बचाना हमारा कर्तव्य है। - “कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
उत्तरः यह पंक्ति भारत की समृद्धि, उर्वरता और सुंदरता को दर्शाती है।
. कनक धन (सोना)
कमल → सुंदरता
शस्य फसल (अन्न) - “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
उत्तरः हिमालय भारत के उत्तर में स्थित है और बर्फ से ढका हुआ बहुत सुंदर दिखाई देता है। इसलिए उसे भारत माता का मुकुट (ताज) कहा गया है, जो उसकी शोभा बढ़ाता है।
विधा से संवाद कविता का सौंदर्य नीचे दी गई पंक्तियों को पढ़िए – “भारति, जय, विजयकरे ! कनक-शस्य-कमलधरे!” इन पंक्तियों में कवि ने चित्रात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए भारतभूमि का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। इस कविता की कुछ अन्य विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। कविता में से उन विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए-
| विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
|---|---|
| प्रकृति का मानवीकरण | “गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल” |
| आलंकारिक प्रयोग | “कनक-शस्य-कमलधरे!” |
| समस्त पद / सामासिक पद | “गर्जितोर्मि”, “ज्योतिर्जल”, “कनक-शस्य”, “चरण-युगल” |
| संस्कृतनिष्ठ भाषा-प्रयोग | “प्राण प्रणव ओंकार / ध्वनित दिशाएँ उदार” |
नोट: “कनक-शस्य-कमलधरे” में रूपक/रूपकात्मक चित्रण के कारण भारतभूमि का अत्यंत सुंदर और चित्रात्मक स्वरूप उभरता है।
विषयों से संवाद
- स्वतंत्रता-पूर्व लिखी इस कविता में भारत को ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक/परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?
उत्तरः आज के बदलते दौर में यदि मुझे भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करना हो, तो मैं प्राचीन विशेषताओं के साथ निम्नलिखित आधुनिक पहलुओं को जोड़ना चाहूँगाः
तकनीकी और डिजिटल शक्तिः भारत आज ‘डिजिटल इंडिया’ और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व कर रहा है।
अंतरिक्ष अन्वेषणः चंद्रयान और मंगलयान जैसी सफलताओं के साथ भारत की वैज्ञानिक प्रगति।
युवा शक्ति और नवाचार (Innovation): भारत के स्टार्टअप्स और युवाओं की उद्यमशीलता।
लोकतांत्रिक सुदृढ़ताः विश्व के सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र के रूप में भारत की पहचान।
वैश्विक शांति दूतः ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना के साथ विश्व कल्याण में भारत की भूमिका।
2. “शतमख-शतरव-मुखरे!” पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना को साकार करते हैं?
उत्तरः “शतमुख-शतरव-मुखरे” का अर्थ है सैकड़ों मुखों से होने वाली गूंज। यह पंक्ति भारत की बहुभाषिकता और सांस्कृतिक विविधता का उत्सव मनाती है:
भारत में अलग-अलग राज्यों के अपने पर्व हैं (जैसे पोंगल, बिहू, बैसाखी, छठ, और गरबा), लेकिन इन सबके पीछे की भावना एक ही है-प्रकृति का आभार और खुशियों को साझा करना।
जब पूरा देश अलग-अलग भाषाओं में एक ही राष्ट्रगान गाता है या अलग-अलग खान-पान के बावजूद एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होता है, तो वह ‘विविधता में एकता’ को प्रदर्शित करता है।
यही अनेकता में छिपी एकता ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की नींव रखती है, जहाँ हर संस्कृति का ‘शतरव’ (सैकड़ों स्वर) मिलकर भारत माता की एक ही जयध्वनि करता है।
3. भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के महत्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तरः भारत की शक्ति उसके भूगोल, इतिहास और दर्शन के संगम में निहित है।
प्रकृतिः हिमालय जैसा सुरक्षा कवच और गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियाँ भारत को आर्थिक और पारिस्थितिक रूप से समृद्ध बनाती हैं। उपजाऊ मिट्टी और विविध जलवायु हमें कृषि में आत्मनिर्भर बनाती है।
संस्कृतिः हमारी संस्कृति सहिष्णुता और सामंजस्य सिखाती है। विभिन्न धर्मों और परंपराओं का सह-अस्तित्व समाज को आंतरिक रूप से मजबूत बनाता है, जिससे राष्ट्र में शांति और स्थिरता बनी रहती है।
ज्ञान-परंपराः प्राचीन वेदों से लेकर आधुनिक विज्ञान तक, भारत हमेशा ‘विश्व गुरु’ रहा है। आयुर्वेद, योग और शून्य (Zero) का आविष्कार हमारे बौद्धिक सामर्थ्य के प्रतीक हैं।
निष्कर्षः जब हम अपनी प्रकृति की रक्षा करेंगे, अपनी संस्कृति पर गर्व करेंगे और अपने ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ेंगे, तभी भारत एक सशक्त राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर चमकता रहेगा।
4. कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तरः कविता में हिमालय को ‘शुभ्र मुकुट’ और गंगा को ‘धवल हार’ (सफेद हार) कहा गया है, लेकिन वर्तमान स्थिति चिंताजनक है:
हिमालय पर प्रभावः ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे आने वाले समय में नदियों के सूखने और अचानक बाढ़ (Cloudbursts) आने का खतरा बढ़ गया है। ‘शुभ्र मुकुट’ की बर्फ कम हो रही है।
नदियों पर प्रभावः औद्योगिक कचरे और प्लास्टिक प्रदूषण ने गंगा जैसी पवित्र नदियों के ‘धवल हार’ को मैला कर दिया है। जल की शुद्धता समाप्त हो रही है और जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में है।
जलवाय परिवर्तनः बेमौसम बारिश और चक्रवात हमारी कृषि (कनक शस्य) को नकसान पहुँचा रहे हैं।
विविध रंग भारत के
आप अपने कक्षा-समूह में मिलकर भारत की सांस्कृतिक विविधता पर आधारित एक पावरपॉइंट प्रस्तुति/पोस्टर/चार्ट/कोलाज तैयार कीजिए और इसे अपनी कक्षा में दिखाइए। आप भारत के विभिन्न राज्यों पर केंद्रित पावरपॉइंट प्रस्तुति/पोस्टर/चार्ट/कोलाज भी बना सकते हैं।
उत्तरः

- मान लीजिए आपको भारत को एक मनुष्य के रूप में कल्पित करते हुए सुसज्जित करने का अवसर मिले तो आप अपने राज्य के किन सांस्कृतिक, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, चिह्नों, पुष्पों आदि का प्रयोग कर उसकी साज-सज्जा करेंगे?
उत्तरः हाँ, बिहार के उदाहरण से उत्तर इस प्रकार बेहतर रहेगा: - उत्तरः यदि भारत को एक मनुष्य के रूप में सजाने का अवसर मिले और मैं बिहार की सांस्कृतिक विरासत का उपयोग करूँ, तो मैं उसे इस प्रकार सुसज्जित करूँगा—
- वेशभूषाः भारत माता को बिहार की प्रसिद्ध भागलपुरी रेशम की साड़ी पहनाऊँगा। पुरुष रूप में कल्पना करने पर उन्हें धोती-कुर्ता और पारंपरिक गमछा पहनाया जा सकता है।
- आभूषणः उनके गले में पारंपरिक हार, कानों में झुमके और हाथों में चाँदी की चूड़ियाँ होंगी। माथे पर कुमकुम का तिलक लगाया जाएगा, जो शुभता और सौभाग्य का प्रतीक है।
- चिह्न और पुष्पः उनके हाथ में तिरंगा और कमल का पुष्प होगा। साथ ही, बिहार की प्रसिद्ध मधुबनी चित्रकला की आकृतियों से उनकी साज-सज्जा को सजाया जाएगा। इस प्रकार भारत की साज-सज्जा में बिहार की कला, संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन की सुंदर झलक दिखाई देगी।
2. भारत पर आधारित एक डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के लिए आवरण पृष्ठ बनाइए और बताइए कि आप उसमें किन-किन प्रतीकों को सम्मिलित करेंगे और क्यों?
उत्तरः भारत पर आधारित डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के आवरण पृष्ठ में मैं निम्नलिखित प्रतीकों को शामिल करूँगा—
- अशोक चक्रः बीच में अशोक चक्र होगा, जो धर्म, न्याय और निरंतर प्रगति का प्रतीक है।
- कमल का फूलः यह भारत का राष्ट्रीय पुष्प है और पवित्रता तथा संघर्ष के बीच खिलने की प्रेरणा देता है।
- इसरो का रॉकेटः यह भारत की वैज्ञानिक प्रगति और अंतरिक्ष के क्षेत्र में उपलब्धियों को दर्शाएगा।
- गेहूँ की बालियाँः ये भारतीय किसानों, कृषि और देश की खाद्य समृद्धि का प्रतीक होंगी।
- विभिन्न धर्मों के प्रतीकः इन्हें छोटे और सुंदर रूप में शामिल किया जाएगा, जो भारत की विविधता और सर्वधर्म समभाव को दर्शाएँगे।
- लहराता हुआ तिरंगाः इसे पृष्ठभूमि में रखा जाएगा, जो देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना जगाएगा।
कारणः इन सभी प्रतीकों के माध्यम से भारत की प्राचीन संस्कृति, विविधता, कृषि, वैज्ञानिक प्रगति और राष्ट्रीय एकता को एक साथ प्रस्तुत किया जा सकता है। इससे यह संदेश मिलेगा कि भारत अपनी परंपराओं को सँजोते हुए निरंतर प्रगति की ओर बढ़ रहा है।
- नदी की यात्रा
गंगा नदी की अपने उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में विलीन होने तक की पूरी यात्रा के बीच में आने वाली प्राकृतिक, सांस्कृतिक, भाषिक आदि विशेषताओं का वर्णन करते हुए एक रोचक यात्रा-वृत्तांत लिखिए।
(संकेत – पर्वतीय सौंदर्य से लेकर गंगासागर तक की संस्कृति इत्यादि)
उत्तरः गंगा नदी की यात्रा (यात्रा-वृत्तांत)
उत्तरः गंगा नदी की यात्रा (यात्रा-वृत्तांत)
मुक्ति की धारा—मेरी यात्रा
“मैं गंगा हूँ। मेरी यात्रा हिमालय की बर्फ से ढकी ऊँची चोटियों के बीच स्थित गोमुख से आरंभ होती है। यहाँ मैं एक छोटी, निर्मल और चंचल धारा के रूप में चट्टानों के बीच कल-कल करती हुई आगे बढ़ती हूँ। ऊँचे पर्वत, हरे-भरे जंगल और ठंडी हवाएँ मेरी यात्रा को सुंदर बना देते हैं।
ऋषिकेश और हरिद्वार पहुँचते-पहुँचते मेरा रूप शांत और गंभीर हो जाता है। मेरे किनारे मंदिरों की घंटियाँ, मंत्रोच्चार और आरती की ध्वनि सुनाई देती है। संध्या के समय जब असंख्य दीपक मेरी लहरों पर तैरते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों।
आगे बढ़ते हुए मैं उत्तर प्रदेश और बिहार के विशाल मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती हूँ। यहाँ मेरे जल से खेतों में हरियाली आती है और किसान अपनी फसलों को सींचते हैं। प्रयागराज में यमुना से मेरा संगम होता है। यह स्थान अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है।
वाराणसी पहुँचकर मैं प्राचीन घाटों, मंदिरों, आरती और मंत्रोच्चार की साक्षी बनती हूँ। यहाँ की संस्कृति और लोकजीवन में मेरी विशेष पहचान है। बिहार से गुजरते समय यहाँ की लोकभाषाओं, लोकगीतों और ग्रामीण जीवन की झलक मेरी यात्रा में नए रंग भर देती है।
इसके बाद मैं पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ती हूँ। यहाँ भाषा, खान-पान और संस्कृति में कुछ बदलाव दिखाई देता है। लोग मुझे श्रद्धा से ‘माँ गंगा’ कहते हैं। सुंदरबन के डेल्टा क्षेत्र से गुजरते हुए मैं अंततः गंगासागर पहुँचती हूँ और विशाल बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती हूँ।
मेरी यह यात्रा केवल एक नदी के बहने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत की प्रकृति, संस्कृति, भाषा, आस्था, कृषि और जनजीवन की निरंतर बहती हुई कहानी है।”
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात बहुभाषी देश हमारा भारत की एक विशेषता उसकी बहुभाषिकता है। यदि आपको एक सचेत नागरिक के रूप में भारत से अपनी मातृभाषा में संवाद का अवसर मिले तो आप किन विषयों पर और क्या-क्या संवाद करना चाहेंगे? इन संवादों को अपनी मातृभाषा और हिंदी में लिखिए। (संकेत – समाज, पर्यावरण, संस्कृति आदि।)
उत्तरः भारत एक बहुभाषी देश है। यहाँ अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं और प्रत्येक भाषा हमारी सांस्कृतिक विविधता की पहचान है। यदि मुझे एक सचेत नागरिक के रूप में भारत से अपनी मातृभाषा में संवाद करने का अवसर मिले, तो मैं पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक एकता और संस्कृति जैसे विषयों पर बातचीत करना चाहूँगा।
1. मातृभाषा — भोजपुरी
विषयः पर्यावरण अउरी सामाजिक एकता
“हे भारत देस! हम तोहार एगो जागरूक नागरिक हईं। आज हम तोहरा से अपना मन के बात कहे चाहत बानी। तोहार गोद में जे हरियर जंगल, पहाड़ अउरी नदिया बाड़ी सऽ, ओह सभ के बचावल हमनी के जिम्मेदारी हऽ। विकास जरूरी बा, बाकिर प्रकृति के नुकसान पहुँचा के ना।
हमनी के समाज में तरह-तरह के भाषा, धर्म अउरी संस्कृति के लोग रहेलन। ई विविधता हमनी के ताकत हऽ। अगर हमनी जात-पात अउरी धर्म के भेदभाव भुला के एक-दूसरा के सम्मान करीं अउरी प्रेम से रहीं, त भारत अउरी मजबूत बनी।
हमनी के अपना संस्कृति, परंपरा अउरी भाषा के सम्मान करत आधुनिकता के भी अपनावे के चाहीं। एही से भारत के एकता अउरी समृद्धि बढ़ी।”
2. हिंदी अनुवाद
विषयः पर्यावरण और सामाजिक एकता
“हे भारत देश! मैं तुम्हारा एक जागरूक नागरिक हूँ। आज मैं तुमसे अपने मन की बात कहना चाहता हूँ। तुम्हारी गोद में जो हरे-भरे जंगल, पर्वत और नदियाँ हैं, उनकी रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है। विकास आवश्यक है, लेकिन प्रकृति को नुकसान पहुँचाकर नहीं।
हमारे समाज में अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों के लोग रहते हैं। यही विविधता हमारी शक्ति है। यदि हम जाति और धर्म के भेदभाव को भूलकर एक-दूसरे का सम्मान करें और प्रेम से रहें, तो भारत और अधिक मजबूत बनेगा।
हमें अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करते हुए आधुनिकता को भी अपनाना चाहिए। इससे भारत की एकता और समृद्धि और बढ़ेगी।”
संवाद के मुख्य बिंदु
- पर्यावरणः नदियों, जंगलों और पर्वतों की रक्षा करना।
- समाजः भेदभाव मिटाकर भाईचारे और एकता को बढ़ावा देना।
- संस्कृतिः अपनी भाषा, परंपराओं और संस्कृति का सम्मान करना।
- आधुनिकताः परंपराओं को सँजोते हुए आधुनिक विकास को अपनाना।
मातृभाषा और भाव “स्तव कर बहु-अर्थ-भरे” उपर्युक्त पंक्ति में भारत की प्रशंसा विविध अर्थों में की गई है। आप भी अपनी मातृभाषा में भारत की स्तुति के लिए एक कविता की रचना कीजिए और उसका भावार्थ हिंदी में भी लिखिए।
उत्तरः मातृभाषा (हिंदी) में भारत स्तुति
मेरा भारत
भारत मेरी शान है,
भारत मेरी जान है।
हिमालय जिसका मुकुट सजे,
गंगा जिसकी पहचान है।
रंग-बिरंगी भाषा-बोली,
विविध संस्कृति महान है।
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे,
सबमें बसता हिंदुस्तान है।
खेतों में लहराएँ फसलें,
वन में हरियाली मुस्काए।
वीरों की धरती भारत माँ,
दुनिया में अपना मान बढ़ाए।
एकता की डोर में बँधा,
मेरा प्यारा देश महान है।
सदा रहे यह सुखी-समृद्ध,
भारत मेरा अभिमान है।
भावार्थ
इस कविता में भारत की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता की प्रशंसा की गई है। भारत को हिमालय, गंगा, हरे-भरे खेतों और विभिन्न भाषाओं तथा संस्कृतियों से समृद्ध देश बताया गया है। कविता का मुख्य भाव यह है कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और प्रत्येक भारतीय को अपने देश पर गर्व होना चाहिए।
समास समस्त पद एवं विग्रह “कनक-शस्य-कमलधरे”
आपके दिए हुए उत्तर को थोड़ा सही, स्पष्ट और व्याकरण की दृष्टि से व्यवस्थित करके इस प्रकार लिखा जा सकता है—
उत्तरः
| समस्त पद (सामासिक शब्द) | समास-विग्रह | समास का नाम |
|---|---|---|
| शतदल | शत (सौ) दलों का समूह | द्विगु समास |
| ज्योतिर्जल | ज्योति रूपी जल | कर्मधारय समास |
| शतमुख | शत (सौ) मुखों का समूह | द्विगु समास |
| सागरजल | सागर का जल | संबंध तत्पुरुष समास |
कविता के अन्य सामासिक पदों के उदाहरण—
- कनक-शस्य — कनक (सोने) के समान शस्य (फसल) — कर्मधारय समास
- हिम-तुषार — हिम का तुषार — संबंध तत्पुरुष समास
- पदतल — पद (पैर) का तल — संबंध तत्पुरुष समास
- शतदल — शत (सौ) दलों का समूह — द्विगु समास
- कनक-किरण — कनक (सोने) के समान किरण — कर्मधारय समास
(क) कविता में अनुप्रास अलंकार वाली पंक्तियाँ
उत्तरः कविता में जहाँ एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति हुई है, वहाँ अनुप्रास अलंकार है। उदाहरण—
- “भारति, जय, विजयकरे!”
→ ‘ज’ वर्ण की पुनरावृत्ति — अनुप्रास अलंकार - “कनक-शस्य-कमलधरे!”
→ ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति — अनुप्रास अलंकार - “धोता शुचि चरण युगल”
→ ‘च’ वर्ण की पुनरावृत्ति — अनुप्रास अलंकार - “तरु-तृण-वन-लता वसन”
→ ‘त’ वर्ण की पुनरावृत्ति — अनुप्रास अलंकार - “शतमुख-शतरव-मुखरे!”
→ ‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति — अनुप्रास अलंकार
(ख) कविता में रूपक अलंकार
उत्तरः रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान के बीच का भेद समाप्त करके दोनों को एक ही रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कविता में प्रकृति के विभिन्न रूपों को भारत माता के आभूषण और वस्त्र के रूप में चित्रित किया गया है।
रूपक अलंकार वाली प्रमुख पंक्तियाँ—
- “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार”
→ हिमालय को भारत माता का मुकुट माना गया है। - “धवल धार हार गले”
→ गंगा की धवल धारा को भारत माता के गले का हार माना गया है। - “तरु-तृण-वन-लता वसन”
→ वृक्ष, घास, वन और लताओं को भारत माता के वस्त्र माना गया है। - “लंका पदतल शतदल”
→ लंका को भारत माता के चरणों के नीचे स्थित कमल के रूप में चित्रित किया गया है।
निष्कर्षः निराला जी ने रूपक अलंकार के माध्यम से हिमालय, गंगा, वनस्पति आदि प्राकृतिक तत्वों को भारत माता के शरीर और श्रृंगार से जोड़ दिया है। इससे भारत का स्वरूप भव्य, सुंदर और दिव्य दिखाई देता है।
गतिविधियाँ
मिलकर लें शपथ
उत्तरः
भारत में वनों, वन्यजीवों और पर्यावरण की रक्षा के लिए कई कानून बनाए गए हैं। प्रमुख अधिनियम निम्नलिखित हैं—
- भारतीय वन अधिनियम, 1927: यह वनों और वन उपज के संरक्षण तथा उनके उपयोग और आवागमन को नियंत्रित करता है।
- वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980: इसका उद्देश्य वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग को नियंत्रित करना और वनों के संरक्षण को बढ़ावा देना है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: यह वन्यजीवों और उनके आवासों की रक्षा तथा अवैध शिकार और व्यापार पर रोक लगाने के लिए बनाया गया है।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: यह वायु, जल, मिट्टी और पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा के लिए व्यापक प्रावधान करता है।
वन संरक्षण के लिए आवश्यक नियम
- वृक्षारोपण और पुनर्वनीकरण: पेड़ों की कटाई के साथ नए पौधे लगाना और उनकी उचित देखभाल करना आवश्यक है।
- अवैध कटाई पर रोक: बिना अनुमति पेड़ों को काटना और जंगलों को नुकसान पहुँचाना रोकना चाहिए।
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी: वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को वन संरक्षण से जोड़ना चाहिए।
- वनों में आग से बचाव: जंगलों में आग लगाने और लापरवाही से आग फैलने से रोकने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए।
- जन-जागरूकता: विद्यालयों और समाज में वृक्षारोपण तथा वन संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलानी चाहिए।
हमारी शपथ
“मैं शपथ लेता/लेती हूँ कि मैं भारत के पेड़-पौधों, वनों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करूँगा/करूँगी। मैं अधिक से अधिक पौधे लगाऊँगा/लगाऊँगी और उनकी देखभाल भी करूँगा/करूँगी। मैं वनों को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा/पहुँचाऊँगी और अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ, सुंदर और हरा-भरा रखने का हर संभव प्रयास करूँगा/करूँगी।”

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