NCERT Solutions for Class 9 Hindi GANGA Chapter 9 (CBSE)भावार्थ और प्रश्नोत्तर
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी ।।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती ।।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा ।।
अर्थः -प्रभु। मेरे मन में जो आपके नाम की रट लग गई है, वह कैसे छूट सकती है? अब मैं आपका परम भक्त हो गया हूँ। जिस तरह चंदन के संपर्क में रहने से पानी में उसकी सुगंध फैल जाती है, उसी प्रकार मेरे तन मन में आपके प्रेम की सुगंध बस गई है। अगर आप आकाश में छाए काले बादल के समान हैं , तो मैं जंगल में नाचने वाला मोर हूँ। जैसे बरसात में उमड़ते बादलों को देखकर मोर खुशी से नाचने लगता है, उसी प्रकार मैं आपके दर्शन को पा कर खुश हो रहा हूँ। जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा की ओर ताकता रहता है उसी भाँति मैं भी सदा आपका प्रेम को पाने के लिए तरसता रहता हूँ। हे प्रभु! अगर आप दीपक हो तो मैं उस दिए की बाती, जो सदा आपके प्रेम में जलता है। और प्रभु आप मोती हैं तो मैं उसमें पिरोया हुआ धागा हूँ। आपका और मेरा मिलन सोने और सुहागे के मिलन के समान पवित्र है। जैसे सुहागे के संपर्क से सोना शुद्ध हो जाता है, उसी तरह मैं आपके संपर्क में आने से शुद्ध हो जाता हूँ। हे प्रभु। आप स्वामी हो और मैं आपका दास हूँ।
शब्दार्थ-
चंदन: एक प्रसिद्ध वृक्ष जिसकी लकड़ी एक मुख्य सुगंधित पदार्थ (गंधद्रव्य) है; इसे संदल भी कहते हैं या चंदन को घिसकर बनाया गया लेप।
बास: इसका अर्थ सुगंध (गंध) है; इसके अन्य अर्थ निवास, वासस्थान या वस्त्र भी होते हैं।
घन: बादल, मेघ, अंधकार, समूह या विस्तार।
चितवत / चितवन / चितवना: किसी की ओर देखने का ढंग, दृष्टि, देखना या निरखना।
चकोरा / चकोर: तीतर की जाति का एक पक्षी जिसे चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है।
जोति / ज्योति: प्रकाश, रोशनी, दीपक की लौ, सूर्य या नक्षत्र।
तीर्थ: पुण्य क्षेत्र या वह पवित्र स्थान जहाँ लोग पूजा और स्नान आदि के लिए जाते हैं, जैसे काशी, प्रयाग, मथुरा आदि।
अंदेसा: सोच, चिंता, शक, आशंका, खतरा, हानि या दुविधा।
सुहागा: एक प्राकृतिक खनिज जिसका उपयोग सोने की अशुद्धियों को दूर करने और उसकी चमक बढ़ाने के लिए किया जाता है।
बाती: दीपक के अंदर जलने वाली सूती धागे की बत्ती।
राती: रात या रात्रि।
बरै: जलना या प्रज्वलित होना।
धागा: सूत या रेशम का तार जिसमें मोतियों को पिरोया जाता है।
दासा: सेवक या दास।
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
अर्थः – – रैदास कहते हैं कि हे राम! यदि आप मुझसे नाता तोड़ना भी चाहें, तो भी मैं आपसे अपना संबंध नहीं तोड़ूँगा। आपसे नाता तोड़कर मैं और किससे जुड़ूँगा? वे स्पष्ट करते हैं कि उन्हें अब किसी तीर्थ (पुण्य क्षेत्र) या व्रत करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्हें केवल प्रभु के चरण-कमलों पर ही पूरा भरोसा है। भक्त जहाँ भी जाता है, उसे वहाँ ईश्वर की ही पूजा नज़र आती है। उसके लिए प्रभु के समान दूसरा कोई देव नहीं है।रैदास ने अपना मन पूरी तरह से ‘हरि’ (ईश्वर) से जोड़ लिया है और सांसारिक मोह-माया के बंधनों को तोड़ दिया है। वे मन, कर्म और वचन से केवल प्रभु की ही आशा रखते हैं
शब्दार्थ
तीरथ (तीर्थ) – पवित्र धार्मिक स्थान
बरत (व्रत) – उपवास / धार्मिक नियम दूजा- दूसरा
अंदेशा – चिंता / डर
चरन कमल – भगवान के चरण (सम्मानपूर्वक) जोरौ (जोड़ना) – संबंध जोड़ना
तोरौ (तोड़ना) – संबंध तोड़ना
भरोसा – विश्वास
जोति/ज्योति – प्रकाश, रोशनी, चंद्रमा, नक्षत्र
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- “अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है?
(क) नाम उच्चारण की कठिनाई
(ख) नाम रटकर याद करना
(ग) आराध्य का नाम जपना
(घ) मित्रों का नाम रटना
उत्तरः (ग) आराध्य का नाम जपना
तर्कः इस पंक्ति में कवि यह कहना चाहते हैं कि उनके मन में राम के नाम की लगन लग गई है, जो अब निरंतर जाप में बदल चुकी है। - “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?
(क) एकाकार और समरूप
(ख) तरल और तीव्र सुगंध
(ग) आश्रय और आश्रित
(घ) द्रव और ठोस
उत्तरः (क) एकाकार और समरूप - तर्कः जैसे पानी में चंदन घिसने पर वे मिलकर एक हो जाते हैं और पानी में चंदन की महक समा जाती है, वैसे ही भक्त का अस्तित्व ईश्वर में विलीन हो गया है।
- “तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?
(क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।
(ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।
(ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है।
(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
उत्तरः (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
तर्कः जैसे दीपक और बाती मिलकर प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही ईश्वर के सान्निध्य में भक्त का जीवन ज्ञान के प्रकाश से भर जाता है। - “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?
(क) परोपकारी भक्ति भाव
(ख) आराध्य से अटूट संबंध
(ग) सांसारिक मोह
(घ) कर्मकांड पर बल
उत्तरः (ख) आराध्य से अटूट संबंध
तर्कः कवि स्पष्ट कर रहे हैं कि भले ही संसार या परिस्थितियाँ बाधा डालें, पर प्रभु से उनका नाता अटूट है और वे उसे कभी नहीं तोड़ेंगे। 6. “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?
(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।
(ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं।
(ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।
(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
उत्तरः (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
तर्कः रैदास बाहरी कर्मकांडों (तीर्थ-व्रत) पर संदेह व्यक्त करते हुए ईश्वर के चरणों की भक्ति को ही वास्तविक और सुरक्षित स्थान मानते हैं। - सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?
(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”
(ख) “जाकी जोति बरै दिन राती”
(ग) “तुम दीपक, हम बाती”
(घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”
उत्तरः (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”
तर्कः इस पंक्ति का अर्थ है कि भक्त जहाँ भी जाता है, उसे ईश्वर का ही आभास होता है और वह वहीं उनकी पूजा करता है। यह ईश्वर की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।
अर्थ और भाव
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।
(क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
उत्तरः रैदास कहते हैं कि हे प्रभु! आप आकाश में छाए हुए काले बादलों के समान हैं और मैं वन में नाचने वाला मोर हूँ, जो बादलों को देखकर हर्षित होता है। साथ ही, जैसे चकोर पक्षी बिना पलक झपकाए चंद्रमा को निहारता रहता है, मेरा मन भी आपके दर्शनों के लिए वैसे ही लालायित रहता है।
(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”
उत्तरः कवि का मानना है कि उन्हें तीर्थ यात्राओं या कठिन व्रतों की कोई आवश्यकता या संशय नहीं है। उन्हें केवल अपने आराध्य के ‘चरण-कमलों’ (ईश्वर की शरण) पर ही अटूट विश्वास और भरोसा है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए –
- “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
उत्तर :
“जो तुम तोरौ राम, मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में संत रैदास की अपने आराध्य भगवान राम के प्रति अटूट श्रद्धा, गहरी भक्ति और पूर्ण समर्पण का भाव व्यक्त हुआ है।
इस पंक्ति का अर्थ है कि यदि भगवान स्वयं भी भक्त से अपना संबंध तोड़ लें, तब भी सच्चा भक्त अपने भगवान से संबंध नहीं तोड़ता। रैदास जी का विश्वास है कि उनका जीवन, सुख-दुःख और अस्तित्व सब कुछ भगवान पर ही निर्भर है। इसलिए वे किसी भी परिस्थिति में अपने प्रभु का साथ नहीं छोड़ सकते।
इस पंक्ति से यह भी स्पष्ट होता है कि सच्ची भक्ति स्वार्थ पर आधारित नहीं होती। भक्त भगवान की पूजा किसी लाभ या इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं करता, बल्कि प्रेम, विश्वास और समर्पण के कारण करता है। रैदास जी के हृदय में अपने आराध्य के प्रति इतना गहरा प्रेम है कि वे उनसे अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकते।
2. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
उत्तर :संत रैदास ने तीर्थयात्रा, व्रत, पूजा-पाठ और बाहरी आडंबरों के स्थान पर सच्चे प्रेम, श्रद्धा और नाम-स्मरण को भक्ति का प्रमुख आधार माना है। उनके अनुसार यदि मन निर्मल है और हृदय में ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति है, तो तीर्थ और व्रत की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
रैदास जी का मानना है कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग प्रेम, विश्वास और पूर्ण समर्पण है। केवल बाहरी कर्मकांड करने से नहीं, बल्कि सच्चे मन से ईश्वर का स्मरण करने से भक्ति सफल होती है।
मेरे विचार से भक्ति के प्रमुख आधार हैं—
- ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास।
- सच्चा प्रेम और श्रद्धा।
- मन की पवित्रता और निष्कपटता।
- दया, करुणा और सेवा-भाव।
- सत्य एवं सदाचार का पालन।
- अहंकार का त्याग और समर्पण की भावना।
- दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों / उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।
उत्तरः पदों में प्रयुक्त प्रतीकों और उपमाओं की सूची नीचे दी गई है:
| आराध्य (भगवान) | भक्त (रैदास) | संबंध का प्रतीक / भाव |
|---|
| चंदन | पानी | जैसे पानी में चंदन घिसने से उसकी सुगंध पानी के कण-कण में समा जाती है, वैसे ही भक्त के जीवन में ईश्वर का प्रभाव व्याप्त हो जाता है। |
| घन (बादल) | मोरा (मोर) | जैसे बादलों को देखकर मोर आनंद से नाच उठता है, वैसे ही भक्त भगवान के दर्शन और स्मरण से आनंदित हो जाता है। |
| चंद (चंद्रमा) | चकोरा | जैसे चकोर पक्षी एकटक चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही भक्त का मन सदैव ईश्वर में लगा रहता है। |
| दीपक | बाती | जैसे बाती दीपक के साथ जलकर प्रकाश फैलाती है, वैसे ही भक्त ईश्वर के साथ जुड़कर जीवन को सार्थक बनाता है। |
| मोती | धागा | जैसे धागा मोतियों को जोड़कर सुंदर माला बनाता है, वैसे ही भक्त और भगवान का संबंध अटूट और परस्पर पूरक होता है। |
| सोना | सुहागा | जैसे सुहागा सोने को शुद्ध और चमकदार बनाता है, वैसे ही ईश्वर की कृपा भक्त के जीवन को श्रेष्ठ बनाती है। |
| स्वामी | दासा (सेवक) | भक्त स्वयं को भगवान का सेवक मानता है और पूर्ण समर्पण की भावना रखता है। |
विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
.
“प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
उपर्युक्त पंक्ति के रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए। इसमें अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।”
उपर्युक्त रेखांकित अंश में उपमा अलंकार है। किसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर जब किसी वस्तु या व्यक्ति के रूप, गुण, धर्म का वर्णन किया जाता है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है।
“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”
उपर्युक्त रेखांकित अंश में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित किया जाए।
अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तरः अलंकारों के अन्य उदाहरण
- अनुप्रास अलंकार परिभाषाः जहाँ एक ही व्यंजन वर्ण की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरणः “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।”
→ तर्कः यहाँ ‘च’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।
.
उदाहरण: “जाकी जोति बरै दिन राती।”
→ तर्कः यहाँ ‘ज’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास का सौंदर्य है।उपमा अलंकार परिभाषाः जहाँ किसी प्रसिद्ध वस्तु से समानता दिखाते हुए ‘जैसे’, ‘ज्यों’, ‘समान’ आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
उदाहरणः “प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती।”
→ तर्कः यहाँ भक्त और भगवान के अटूट संबंध की तुलना दीपक और बाती की अटूट जोड़ी से की गई है।
उदाहरण: “जैसे सोने मिलत सुहागा।” .
→ तर्कः यहाँ भक्त का ईश्वर में मिल जाना ठीक वैसा ही बताया गया है जैसे सोने में सुहागा मिलने से उसकी शुद्धता और चमक बढ़ जाती है। - रूपक अलंकार परिभाषाः जहाँ उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) और उपमान (जिससे तुलना की जाए) में कोई भेद न रहे और उन्हें एक ही मान लिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।
उदाहरणः “अब कैसे छूटै राम रट लागी।”
→ तर्कः यहाँ ‘राम’ के नाम और ‘रट’ (लगाव) को अभिन्न माना गया है।
उदाहरणः “तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”
→ तर्कः यहाँ ईश्वर के चरणों को ही कमल का रूप दे दिया गया है, अर्थात चरणों और कमल में कोई अंतर नहीं रखा गया है।
कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ
नीचे दी गई सूची को ध्यान से देखिए। इस सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ चुनकर दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए। उदाहरण के लिए पहली विशेषता के सामने पंक्ति दी गई है।
| विशेषताएँ | उदाहरण |
|---|---|
| अनन्य भक्ति भाव | “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” |
| सरल और लोकधर्मी भाषा | “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।” |
| उपमा और तुलना | “जैसे चितवत चंद चकोरा।” / “जैसे सोने मिलत सुहागा।” |
| लयात्मकता और गेयता / ध्वन्यात्मकता | “प्रभु जी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।” |
| दृढ़ निष्ठा और आस्था | “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।” |
विषयों से संवाद
- तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं? (संकेत आप अपने सामाजिक विज्ञान के शिक्षक की सहायता भी ले सकते हैं। उत्तरः भक्तिकाल के दौरान संत रैदास और कबीर ने बाह्य आडंबरों (तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा) के स्थान पर निराकार आराध्य की आंतरिक भक्ति पर बल दिया। तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थेः.
- जाति-पाति और छुआछूत का विरोधः उस समय का समाज ऊँच-नीच और जातिवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। कई वर्गों को मंदिरों में प्रवेश और धार्मिक अनुष्ठानों की अनुमति नहीं थी। निराकार भक्ति ने यह संदेश दिया कि ईश्वर किसी विशेष स्थान या कर्मकांड के अधीन नहीं है, वह सबके भीतर है।
- धार्मिक आडंबरों की जटिलताः तत्कालीन समय में धर्म कर्मकांडों और कठिन व्रतों में उलझ गया था, जिसे साधारण जनता के लिए निभाना कठिन था। संतों ने सरल और सहज प्रेम मार्ग (निराकार भक्ति) सुझाया जिसे कोई भी अपना सकता था।
- सामाजिक समरसता और एकताः निराकार ईश्वर की अवधारणा ने हिंदू-मुस्लिम और विभिन्न जातियों के बीच की दूरियों को कम करने का प्रयास किया। जब ईश्वर का कोई आकार नहीं है, तो उसे पूजने का अधिकार भी सबका समान है।
- अंतःकरण की शुद्धि पर बलः रैदास और कबीर का मानना था कि मन की पवित्रता ही सच्ची तीर्थ यात्रा है। उनके अनुसार, “मन चंगा तो कठौती में गंगा,” अर्थात यदि मन शुद्ध है, तो घर बैठे ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है। 2. “सोने मिलत सुहागा”
‘सुहागा’ एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। ‘सुहागा’ का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।
उत्तरः कविता में प्रयुक्त पंक्ति “जैसे सोने मिलत सुहागा” के संदर्भ में सुहागा का वैज्ञानिक विवरण इस प्रकार है:
रासायनिक नामः सोडियम टेट्राबोरेट डेकाहाइड्रेट (Na2B4O7-10H2O) है।
प्रकृतिः यह एक प्राकृतिक खनिज (Mineral) है जो आमतौर पर झीलों के वाष्पीकरण से प्राप्त होता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
सोने की शुद्धि (Cleaning Agent): सुहागा एक बेहतरीन ‘फ्लक्स’ (Flux) के रूप में कार्य करता है। जब सोने को सुहागे के साथ गर्म किया जाता है, तो यह सोने में मौजूद तांबे और अन्य धातुओं की अशुद्धियों को सोख लेता है, जिससे सोना शुद्ध और अधिक चमकदार हो जाता है।
सफाई और कीटाणुशोधनः इसका उपयोग कपड़ों की सफाई (Laundry) और कीटाणुनाशक के रूप में भी किया जाता है।
कांच और सिरेमिक उद्योगः यह कांच को ऊष्मा-प्रतिरोधी (Heat-resistant) बनाने में मदद करता है।
-लौ परीक्षण (Flame Test): विज्ञान की प्रयोगशाला में बोरेक्स मनका परीक्षण (Borax Bead Test) द्वारा विभिन्न धातुओं की पहचान की जाती है।
रैदास ने इसी वैज्ञानिक सत्य का उपयोग यह समझाने के लिए किया है कि जैसे सुहागा सोने के मूल्य और चमक को बढ़ा देता है, वैसे ही ईश्वर की भक्ति भक्त के व्यक्तित्व को निखार कर उसे पावन बना देती है।
व्याकरण की बात
शब्दों की बात
पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
1. संज्ञा (Noun) के उदाहरण:
संज्ञा किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या भाव के नाम को कहते हैं। पदों में प्रयुक्त उदाहरण इस प्रकार हैं:
- राम: ईश्वर का नाम।
- चंदन: एक सुगंधित वृक्ष या लकड़ी।
- दीपक: प्रकाश उत्पन्न करने वाला पात्र।
- (अन्य उदाहरण: पानी, मोती, धागा, स्वामी, रैदासा)
2. सर्वनाम (Pronoun) के उदाहरण:
संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं। पदों में प्रयुक्त उदाहरण इस प्रकार हैं:
- तुम: आराध्य (प्रभु) के लिए प्रयुक्त शब्द।
- हम: भक्त (स्वयं) के लिए प्रयुक्त शब्द।
- मैं: रैदास ने स्वयं के संबोधन के लिए इसका प्रयोग किया है (जैसे: “मैं नहिं तोरौ”)।
- (अन्य उदाहरण: तुम्हारी, अपनो, कवन)
- रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए।
मोरा, चकोरा, बाती, राती, सोने, तीरथ, बरत
उत्तरः संत रविदास के पदों में प्रयुक्त शब्दों के स्थान पर प्रचलित शब्द इस प्रकार हैं-
| दिए गए शब्द | प्रचलित / अन्य शब्द |
|---|---|
| मोरा | मोर |
| चकोरा | चकोर |
| बाती | बत्ती |
| राती | रात |
| सोने | सोना |
| तीरथ | तीर्थ |
| बरत | व्रत |
सृजन
- कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर /पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः यह एक क्रियात्मक गतिविधि है। विद्यार्थी रैदास के पदों को लय और ताल के साथ कक्षा में प्रस्तुत कर सकते हैं। इन पदों को शास्त्रीय संगीत के राग भैरवी या राग बिलावल में गाना बहुत प्रभावशाली होता है। - कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।
उत्तरः संवाद-लेखन (भक्त और आराध्य के बीच)
संवाद-लेखन (भक्त और आराध्य के बीच)

भक्त (रैदास):
हे प्रभु! मेरा और आपका संबंध चंदन और पानी के समान है। जैसे पानी में चंदन की सुगंध समा जाती है, वैसे ही आपकी भक्ति मेरे तन-मन को सुगंधित कर देती है।
आराध्य (ईश्वर):
प्रिय भक्त! यदि मैं चंदन हूँ, तो तुम वह जल हो जो मेरी सुगंध को संसार में फैलाता है। तुम्हारे बिना मेरा अस्तित्व अधूरा है।
भक्त (रैदास):
प्रभु! आप घन (बादल) हैं और मैं मोर हूँ। आपके दर्शन मात्र से मेरा हृदय आनंद से भर उठता है और मैं प्रसन्नता से झूमने लगता हूँ। जैसे चकोर चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही मेरा मन हर समय आपकी ओर लगा रहता है।
आराध्य (ईश्वर):
वत्स! मैं वह चंद्रमा हूँ जो अपने प्रकाश से तुम्हारे जीवन के अंधकार को दूर करता है। तुम्हारी भक्ति मुझे भी प्रिय है।
भक्त (रैदास):
हे प्रभु! आप दीपक हैं और मैं आपकी बाती हूँ। मैं दिन-रात आपकी भक्ति की ज्योति में जलकर अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहता हूँ।
आराध्य (ईश्वर):
प्रिय भक्त! तुम्हारी अटूट श्रद्धा, प्रेम और समर्पण ही वह प्रकाश है जो न केवल तुम्हारे जीवन को, बल्कि पूरे संसार को आलोकित करता है।
भक्त (रैदास):
प्रभु! आप मेरे स्वामी हैं और मैं आपका सेवक। मेरा एकमात्र भरोसा आपके चरण-कमल हैं।
आराध्य (ईश्वर):
रैदास! जो भक्त सच्चे मन से मेरा स्मरण करता है, मैं सदैव उसके साथ रहता हूँ। तुम्हारी भक्ति ही तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति है।
3. “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।
अटूट मित्रता
एक गाँव में अर्जुन और मोहन नाम के दो मित्र रहते थे। दोनों बचपन से साथ पढ़ते, खेलते और एक-दूसरे की हर कठिनाई में सहायता करते थे। गाँव के लोग उनकी मित्रता की मिसाल देते थे।
एक दिन गाँव में भयंकर बाढ़ आ गई। चारों ओर पानी ही पानी था। लोग अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे थे। इसी बीच मोहन तेज बहाव में फँस गया। वह मदद के लिए पुकारने लगा।
अर्जुन ने जब अपने मित्र की आवाज सुनी, तो बिना अपनी जान की परवाह किए नदी में कूद पड़ा। लोगों ने उसे रोकते हुए कहा, “अपनी जान खतरे में मत डालो।”
अर्जुन ने उत्तर दिया, “मैं अपने मित्र को संकट में छोड़ नहीं सकता।”
बहुत प्रयास के बाद अर्जुन ने मोहन को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। मोहन की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “मित्र, तुमने मेरी जान बचाकर सच्ची मित्रता का परिचय दिया है।”
अर्जुन मुस्कुराकर बोला, “सच्चा मित्र वही होता है जो हर परिस्थिति में साथ निभाए। चाहे कितनी भी कठिनाई आ जाए, मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूँगा।”
उस दिन दोनों मित्रों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर कहा, “जो तुम तोरौ, मैं नहिं तोरौ” अर्थात चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हमारी मित्रता कभी नहीं टूटेगी।
शिक्षा: सच्ची मित्रता विश्वास, त्याग और अटूट साथ पर आधारित होती है।

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